Richa Srivastava
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मझधार

डर लगता है समुन्दर की गहराइयों से साहिल तो कब का छूट गया अंधेरों मे नील ही नील है समुन्दर और आसमान में मझधार मे भूलती हुई समुन्दर के थपेडों में नील जहाँ मे आगे बढ़ने से डरती हूँ साहिल की परछाई का सहारा ढूंढती हूँ